व्लादिमीर पुतिन की ताक़त रूस की ताक़त कैसे बन रही

रूस के क़रीब आज़ोव समंदर के पानी का अशांत होना कोई नई बात नहीं लेकिन रविवार को समंदर में हुई हलचल की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी.

अगले ही दिन हज़ारों नॉटिकल मील दूर न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक हुई. वहां अमरीकी राजदूत निकी हेली रूस को कटघरे में खड़ा कर रही थीं.

"रूस ने जो कोशिश की है, हम उसका विरोध करने के लिए एकजुट हैं. हम यूक्रेन की संप्रभुता और उसकी अतंरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत सीमाओं की अखंडता का मजबूती से समर्थन करते हैं. हम रूस की उकसावे वाली कार्रवाई पर बातचीत करेंगे और रूस की ओर से प्रस्तावित एजेंडे के ख़िलाफ़ वोट करेंगे."

विवाद क्यों हुआ?
अमरीका और दूसरे पश्चिमी देशों की नाराज़गी की वजह रविवार को यूक्रेन के तीन जहाजों के ख़िलाफ़ रूस की ओर से की गई कार्रवाई थी. रूस ने क्राइमिया के तट के क़रीब से गुजरते इन तीन जहाजों पर क़ब्ज़ा कर लिया और चालक दल के 23 सदस्यों को पकड़ लिया.

यूक्रेन और पश्चिमी देशों की आपत्ति के उलट रूस की दलील है कि यूक्रेन के जहाज अवैध रूप से उसके अधिकार वाले समुद्री इलाक़े में दाखिल हुए थे.

यूक्रेन और रूस के बीच विवाद नया नहीं है. साल 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद आज़ाद हुए यूक्रेन का झुकाव पश्चिमी देशों की तरफ़ है और रूस इसे ख़तरे के तौर पर देखता है.

साल 2014 में रूस ने क्राइमिया पर क़ब्ज़ा किया तब से दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हैं.

रूस और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जानकार प्रोफ़ेसर अनुराधा चिनॉय कहती हैं कि अर्से से चले आ रहे विवाद की वजह रूस की वो चिंताएं हैं जिन पर पश्चिमी देशों ने ध्यान नहीं दिया.

वो कहती हैं, "रूस की समझ ये है कि उसकी सीमाओं और नेटो के देशों के बीच अगर कोई कॉरिडोर नहीं होगा तो नेटो धीरे-धीरे उनको भी तोड़ देगा. जब उन्होंने सोवियत संघ को ख़त्म किया तो एक वादा लिया गया था कि नेटो उनकी सीमा तक आगे न आए. लेकिन पूर्व के देश धीरे-धीरे नेटो का हिस्से बन गए. फिर यूक्रेन में एक दक्षिणपंथी पार्टी आ गई जिसने एथनिक रूसी लोगों को पर दबाव डाला. क्राइमिया में रूसी अल्पसंख्यक थे. वहां अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक राजनीति शुरू कर दी गई. रूस इससे तंग हो गया."

दुनिया में कहां खड़ा है रूस?

रूस और यूक्रेन के विवाद को मॉस्को में भारत के राजदूत रहे कंवल सिब्बल ने भी करीब से देखा और समझा है. वो भी उन पहलुओं की बात करते हैं, जिनका ज़िक्र पश्चिमी देशों की ओर से नहीं होता.

कंवल सिब्बल कहते हैं, "यूक्रेन में जो ऑरेंज रेवोल्यूशन हुआ उसका मक़सद क्या था? मकसद यही था कि लोकतंत्र को किसी तरह से रूस की परिधि में ले आएं और फिर ऐसा उदाहरण तैयार करें कि रूस में भी विद्रोह हो जाए. रूस का सिस्टम भी बदल जाए."

शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ महाशक्ति था लेकिन मौजूदा वक़्त में दुनिया के शक्ति केंद्र बदल गए हैं. चीन ने रूस को काफ़ी पीछे छोड़ दिया है और अमरीका के बाद दूसरे नंबर की स्थिति में आ गया है.

तीन साल पहले तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में रूस नौवें नंबर पर था. अब वो 12वें पायदान पर फिसल गया है.

स्वास्थ्य और शिक्षा की ज़रूरतों के लिहाज से उसके संसाधन घट रहे हैं. रूस में जोड़-तोड़ा वाला पूंजीवाद, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी बढ़ने की चर्चा लगातार होती है.

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